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Samveda/1471

अय सोम इन्द्र तुभ्यसुन्वे तुभ्यं पवते त्वमस्य पाहि। त्व ह यं चकृषे त्वं ववृष इन्दुं मदाय युज्याय सोमम्॥१४७१

Veda : Samveda | Mantra No : 1471

In Hindi:

ऋषि : उशना काव्यः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम मन्त्र में आनन्दरस के प्रवाह का वर्णन है।

पदपाठ : अयम् । सोमः । इन्द्र । तुभ्यम् । सुन्वे । तुभ्यम् । सुन्वे । तुभ्यम् । पवते । त्वम् । अस्य । पाहि । त्वम् । ह । यम् । चकृषे । त्वम् । वतृषे । इन्दुम् । मदाय । युज्याय । सोमम्॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) जीवात्मन् ! (अयं सोमः) यह ब्रह्मानन्द-रस (तुभ्यम्) तेरे लिए (सुन्वे) अभिषुत हो रहा है, (तुभ्यम्) तेरे लिए (पवते) प्रवाहित हो रहा है। (त्वम् अस्य पाहि) तू इसका पान कर, (यम्) जिस (इन्दुम्) भिगोनेवाले (सोमम्) ब्रह्मानन्द-रस को (मदाय) उत्साह के लिए, (युज्याय) और ब्रह्म के साथ मैत्री के लिए (त्वं ह) तूने ही (चकृषे) ब्रह्म के पास से उत्पन्न किया है और (त्वम्) तूने ही (ववृषे) उसके पास से अपने ऊपर उसकी वर्षा की है ॥१॥

भावार्थ : परमात्मा के साथ अपने आत्मा का योग करते हुए योगी लोग उसके पास से परमानन्द प्राप्त करके कृतार्थ हो जाते हैं ॥१॥