Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1472

स ई रथो न भुरिषाडयोजि महः पुरूणि सातये वसूनि। आदीं विश्वा नहुष्याणि जाता स्वर्षाता वन ऊर्ध्वा नवन्त॥१४७२

Veda : Samveda | Mantra No : 1472

In Hindi:

ऋषि : उशना काव्यः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा की मैत्री का फल वर्णित है।

पदपाठ : सः । ईम् । रथः । न । भुरिषाट् । अयोजि । महः । पुरुणि । सातये । वसूनि । आत् । ईम् । विश्वा । नहुष्याणि । जाता । स्वर्षाता । स्वः । साता । वने । ऊर्ध्वा । नवन्त॥

पदार्थ : (सः ईम्) वह यह (भुरिषाट्) बहुत-से विघ्नों को परास्त करनेवाला, (महः) महान् सोम नामक जीवात्मा (पुरूणि वसूनि) बहुत से ऐश्वर्यों को (सातये) प्राप्त करने के लिए (रथः न) रथ के समान (अयोजि) परमात्मा के साथ जुड़ गया है। (आत् ईम्) तदनन्तर ही (विश्वा) सब (जाता) बलवान् बने हुए (नहुष्याणि) मनुष्य के मन, बुद्धि आदि (स्वर्षाता) प्रकाश की प्राप्ति हो जाने पर (वने) तेज में (ऊर्ध्वा) ऊर्ध्वगामी होकर (नवन्त) क्रियाशील हो गये हैं ॥२॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥

भावार्थ : जैसे रथ जब बिजली रूप अग्नि के साथ जुड़ जाता है, तब तुरन्त सक्रिय हो जाता है, वैसे ही परमात्मा की मित्रता में जुड़ा हुआ जीवात्मा स्वयं पुरुषार्थी होकर मन, बुद्धि आदि को भी सक्रिय कर देता है ॥२॥