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Samveda/1474

त्वमग्ने यज्ञानाहोता विश्वेषाहितः। देवेभिर्मानुषे जने॥१४७४

Veda : Samveda | Mantra No : 1474

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : वर्धमाना गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में २ क्रमाङ्क पर परमात्मा और सूर्य के विषय में की जा चुकी है। यहाँ परमेश्वर के गुण-कर्मों का वर्णन करते हैं।

पदपाठ : त्वम् । अग्ने । यज्ञानाम । होता । विश्वेपाम् । हितः । देवेभिः । मानुषे । जने॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्रनेता, ज्ञानी, सर्वान्तर्यामी, तेजस्वी, पापों को दग्ध करनेवाले परमेश्वर ! (त्वम्) सर्वोपकारी आप (यज्ञानाम्) देवपूजा, सङ्गतिकरण, दान रूप व्यवहारों के (होता) दाता हो और (विश्वेषाम्) सबके (हितः) हितकर्ता हो। साथ ही (मानुषे जने) मानव-समाज में (देवेभिः) सदाचारी विद्वानों द्वारा [उपासना किये जाते हो] ॥१॥

भावार्थ : जगदीश्वर हमारा पिता होकर हमें सब व्यवहार सिखाता है, न्यायकारी और दयालु होकर सबका हित करता है, इस कारण सब लोगों को उसकी पूजा करनी चाहिए ॥१॥