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Samveda/1483

तदिदास भुवनेषु ज्येष्ठं यतो जज्ञ उग्रस्त्वेषनृम्णः। सद्यो जज्ञानो नि रिणाति शत्रूननु यं विश्वे मदन्त्यूमाः॥१४८३

Veda : Samveda | Mantra No : 1483

In Hindi:

ऋषि : बृहद्दिव आथर्वणः | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रारम्भ में इन्द्र परमात्मा की महिमा वर्णित करते हैं।

पदपाठ : तत् । इत् । आस । भुवनेषु । ज्येष्ठम् । यतः । जज्ञे । उग्रः । त्वेषनृम्णः । त्वेषु । नृम्णः । सद्यः । स । द्यः । जज्ञानः । नि । रिणाति । शत्रून् । अनु । यम् । विश्वे । मदन्ति । ऊमाः॥

पदार्थ : (तत् इत्) वह ब्रह्म ही (भुवनेषु) सूर्य, नक्षत्र आदि लोकलोकान्तरों में (ज्येष्ठम्) ज्येष्ठ (आस) है, (यतः) जिससे (उग्रः) प्रचण्ड, (त्वेषनृम्णः) प्रदीप्त ज्योतिरूप धनवाला अथवा प्रदीप्त बलवाला सूर्य (शत्रून्) अन्धकार, मलिनता, रोग आदि शत्रुओं को (नि रिणाति) विनष्ट करता है, (यम् अनु) जिसकी अनुकूलता से (विश्वे) सब (ऊमाः) रक्षक पृथिवी, मङ्गल, बुध, चन्द्रमा आदि (मदन्ति) प्रकाश और प्राण को प्राप्त करते हैं ॥१॥

भावार्थ : ज्येष्ठ ब्रह्म ही सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, तारामण्डल आदि लोक-लोकान्तरों का निर्माण करके इस ब्रह्माण्ड का सञ्चालन कर रहा है ॥१॥