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Samveda/1486

त्रिकद्रुकेषु महिषो यवाशिरं तुविशुष्मस्तृम्पत्सोममपिबद्विष्णुना सुतं यथावशम्। स ईं ममाद महि कर्म कर्तवे महामुरु सैन सश्चद्देवो देव सत्य इन्दुः सत्यमिन्द्रम्॥१४८६

Veda : Samveda | Mantra No : 1486

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्रः | छन्द : अष्टिः | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ४५७ क्रमाङ्क पर सूर्य-चन्द्र और गुरु-शिष्य में की गयी थी। यहाँ उपास्य-उपासक का विषय दर्शाते हैं।

पदपाठ : त्रिकद्रुकेषु । त्रि । कद्रकेषु । महिषः । यवाशिरम् । यव । आशिरम् । तुविशुष्मः । तुवि । शुष्मः । तृम्पत् । सोमम् । अपिवत् । विष्णुना । सुतम् । यथावशम् । यथा । वशम् । सः । ईम् । ममाद । महि । कर्म । कर्तवे । महाम् । उरुम् । सह । एनम् । सश्चत । देवः । देवम् । सत्यः । इन्दुः । सत्यम् । इन्द्रम्॥

पदार्थ : (त्रिकद्रुकेषु) तीन ऋग्, यजुः, साम रूप साधनोंवाले उपासना-यज्ञों में (महिषः) महान् जीवात्मा (विष्णुना) सर्वव्यापक परमात्मा से (सुतम्) चुआए हुए, (यवाशिरम्) योगाभ्यास से परिपक्व, (तुविशुष्मम्) बहुत बलदायक (सोमम्) ब्रह्मानन्द-रस को (यथावशम्) यथेच्छ (अपिबत्) पीता है। (सः) वह ब्रह्मानन्द-रस (महाम्) महान्, (उरुम्) विस्तृत ज्ञानवाले (ईम्) इस जीवात्मा को (महि कर्म) महान् कर्म (कर्तवे) करने के लिए (ममाद) उत्साहित करता है। (सः) वह (देवः) प्रकाशक, (सत्यः) सत्य, (इन्दुः) उपासक को भिगोनेवाला ब्रह्मानन्द--रस (देवम्) दिव्य-गुण-युक्त, (सत्यम्) सत्य के प्रेमी (एनम् इन्द्रम्) इस जीवात्मा को (सश्चत्) निरन्तर प्राप्त होता रहता है ॥१॥

भावार्थ : वेदमन्त्रों के गानपूर्वक मनुष्य जब परमात्मा को ध्याता है,तब परमात्मा के पास से धारा-प्रवाह में बहता हुआ परमानन्द-रस उसके आत्मा को निरन्तर नहलाता रहता है ॥१॥