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Samveda/1487

साकं जातः क्रतुना साकमोजसा ववक्षिथ साकं वृद्धो वीकयैः सासहिउमृधो विचर्षणिः। दाता राध स्तुवते काम्यं वसु प्रचेतन सैन सश्चद्देवो देव सत्य इन्दुः सत्यमिन्द्रम्॥१४८७

Veda : Samveda | Mantra No : 1487

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्रः | छन्द : अतिशक्वरी | स्वर : पञ्चमः

विषय : अगले मन्त्र में फिर उपास्य-उपासक का विषय है।

पदपाठ : साकम् । जातः । क्रतुना । साकम् । ओजसा । ववक्षिथ । साकम् । वृद्धः । वीर्यः । सासहिः । मृधः । विचर्षणिः । वि । चर्षणिः । दाता । राधः । स्तुवते । काम्यम् । वसु । प्रचेतन् । प्र । चेतन । सः । एनम् । सश्चत् । देवः । देवम् । सत्यः । इन्दुः । सत्यम् । इन्द्रम्॥

पदार्थ : हे इन्द्र जगदीश्वर ! आप (क्रतुना) कर्म और प्रज्ञा के (साकम्) साथ और (ओजसा) बल के (साकम्) साथ (जातः) प्रसिद्ध हो। इसी कारण आप (ववक्षिथ) जगत् के भार को वहन कर रहे हो। आप (वीर्यैः साकम्) पराक्रमों के साथ (वृद्धः) प्रवृद्ध, (मृधः सासहिः) हिंसकों को परास्त करनेवाले, (विचर्षणिः) पुण्यकर्ताओं और अपुण्यकर्ताओं को विवेकपूर्वक देखनेवाले हो। हे (प्रचेतन) उत्कृष्टरूप से चेतानेवाले ! आप (स्तुवते) स्तुतिकर्ता जन के लिए (राधः) सफलता, और (काम्यं वसु) अभीष्ट ऐश्वर्य के (दाता) देनेवाले हो। (सः) वह (देवः) दिव्यगुणोंवाला, (सत्यः) सत्य का प्रेमी (इन्दुः) तेजस्वी स्तोता (एनम्) इस (देवम्) दिव्य गुणोंवाले, (सत्यम्) सत्य गुण, कर्म, स्वभाववाले (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवान् आप जगदीश्वर को (सश्चत्) प्राप्त कर लेवे ॥२॥

भावार्थ : जो ज्ञान, कर्म, बल और पराक्रम में सर्वाधिक है और सदाचारी स्तोता के उत्तम मनोरथों को पूर्ण करनेवाला है, उस जगदीश्वर को ध्याकर और पाकर सब मनुष्य पूर्ण मनोरथोंवाले हों ॥२॥