Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1492

आ नो विश्वासु हव्यमिन्द्र समत्सु भूषत। उप ब्रह्माणि सवनानि वृत्रहन्परमज्या ऋचीषम॥१४९२

Veda : Samveda | Mantra No : 1492

In Hindi:

ऋषि : नृमेध पुरुमेधावाङ्गिरसौ | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में २६९ क्रमाङ्क पर परमेश्वर के विषय में की गयी थी। यहाँ विघ्न दूर करने के लिए परमात्मा और राजा से प्रार्थना करते हैं।

पदपाठ : आ । नः । विश्वासु । हव्यम् । इन्द्रम् । समत्सु । स । मत्सु । भूषत । उप । ब्रह्माणि । सवनानी । वृत्रहन् । हन् । परमज्याः । परम । ज्या । ऋचीषम्॥

पदार्थ : हे राष्ट्रवासी जनो ! तुम (विश्वासु समत्सु) सब देवासुरसंग्रामों में (नः) हम प्रजाजनों के (हव्यम्) आह्वान करने योग्य (इन्द्रम्) परमात्मा वा राजा को (आभूषत) स्वागत-गानों से अलङ्कृत करो। हे (वृत्रहन्) विघ्न-विदारक, पाप-दल के विध्वंसक, (ऋचीषम) स्तोताओं को मान देनेवाले परमात्मन् वा राजन् ! (परमज्याः) प्रबल आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं को विनष्ट करनेवाले आप, हमारे (ब्रह्माणि) ब्रह्मयज्ञों में, तथा (सवनानि) सोमयाग के प्रातः-सवन, माध्यन्दिन-सवन और सायं-सवनों में (उप) आओ ॥१॥

भावार्थ : जैसे जगदीश्वर नास्तिक पापियों को दण्ड देकर और धर्मात्मा आस्तिक लोगों से मित्रता करके धार्मिकता का पोषण करता है, वैसे ही राजा भी करे ॥१॥