Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1493

त्वं दाता प्रथमो राधसामस्यसि सत्य ईशानकृत्। तुविद्युम्नस्य युज्या वृणीमहे पुत्रस्य शवसो महः (या)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥१४९३

Veda : Samveda | Mantra No : 1493

In Hindi:

ऋषि : नृमेध पुरुमेधावाङ्गिरसौ | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : पञ्चमः

विषय : अगले मन्त्र में फिर परमात्मा और राजा का वर्णन है।

पदपाठ : त्वम् । दाना । प्रथमः । राधसाम् । असि । असि । सत्यः । ईशानकृत । ईशान । कृत् । तुविद्युम्नस्य । तुवि । द्युम्नस्य । युज्वा । आ । वृणीमहे । पुत्रस्य । पुत् । त्रस्य । शवसः । महः॥

पदार्थ : हे इन्द्र अर्थात् परमैश्वर्यवान् जगदीश्वर वा राजन् ! (त्वम्) आप (राधसाम्) ऐश्वर्यों के (प्रथमः) श्रेष्ठ (दाता) दाता, (सत्यः) सत्य के प्रेमी और (ईशानकृत्) निर्धनों को भी धन के स्वामी बना देनेवाले (असि) हो। (तुविद्युम्नस्य) बहुत धनी वा यशस्वी, (शवसः पुत्रस्य) बल के पुत्र अर्थात् अति बली, (महः) महान् आपके (युज्या) मित्रभाव को, सहयोग को (वृणीमहे) हम वरते हैं ॥२॥

भावार्थ : परमदानी, अतिशक्तिशाली परमात्मा और राजा की मैत्री को स्वीकार करके निर्धन भी धनवान्, कुछ करने में असमर्थ भी बहुत कार्य कर सकनेवाले, सेवक भी स्वामी और निन्दित भी यशस्वी हो जाते हैं ॥२॥