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Samveda/1503

अग्ने विश्वेभिरग्निभिर्जोषि ब्रह्म सहस्कृत। ये देवत्रा य आयुषु तेभिर्नो महया गिरः॥१५०३

Veda : Samveda | Mantra No : 1503

In Hindi:

ऋषि : अग्निस्तापसः | देवता : विश्वेदेवाः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : प्रथम मन्त्र में अग्नि नाम से जगदीश्वर से प्रार्थना की गयी है।

पदपाठ : अग्ने । विश्वेभिः । अग्निभिः । जोषि । ब्रह्म । सहस्कृत । सहः । कृत । ये । देवत्रा । ये । आयुषु । तेभिः । नः । महय । गिरः॥

पदार्थ : (हे सहस्कृत) ध्यान-बल से प्रकट किये गये (अग्ने) विश्ववन्द्य परमात्मन् ! आप (विश्वेभिः) सब (अग्निभिः) तेजों के साथ (ब्रह्म) हमारे अन्तरात्मा को (जोषि) प्राप्त होओ। (ये) जो तेज (देवत्रा) प्रकाशक बिजली, सूर्य आदियों में हैं और (ये) जो तेज (आयुषु) मनुष्यों में हैं, (तेभिः) उनसे (नः) हमारी (गिरः) वाणियों को (महया) महिमामय करो ॥१॥

भावार्थ : परमात्मा ने जो अग्नियाँ रची हैं, उनसे तेज के तत्त्व को लेकर हम अपने वाणी, मन, बुद्धि, आत्मा आदि को तेजस्वी बनायें ॥१॥