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Samveda/1504

प्र स विश्वेभिरग्निभिरग्निः स यस्य वाजिनः। तनये तोके अस्मदा सम्यङ्वाजैः परीवृतः॥१५०४

Veda : Samveda | Mantra No : 1504

In Hindi:

ऋषि : अग्निस्तापसः | देवता : विश्वेदेवाः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः वही विषय है।

पदपाठ : प्रः । सः । विश्वेभिः । अग्निभिः । अग्निः । सः । यस्य । वाजिनः । तनये । तोके । अस्मत् । आ । सयङ् । वाजैः । परिवृतः । परि । वृतः॥

पदार्थ : (अग्निः) अग्नि नाम से प्रसिद्ध जगदीश्वर (सः) वह है, (यस्य) जिसके रचे हुए (वाजिनः) बलवान् मन, बुद्धि, प्राण, आदि और सूर्य, चन्द्र आदि हैं। (सः) वह (विश्वेभिः अग्निभिः) अपनी रची हुई आग, बिजली, सूर्य आदि सब अग्नियों के कारण (प्र) प्रशंसनीय बना हुआ है। (वाजैः) बलों से (परीवृतः) घिरा हुआ वह (अस्मत्) हममें और (तोके तनये) हमारे पुत्र, पौत्र आदियों में (सम्यङ्) भली-भाँति (आ) आये ॥२॥

भावार्थ : न केवल हम, प्रत्युत हमारी भावी सन्ततियाँ भी अध्यात्ममार्ग की पथिक होवें ॥२॥