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Samveda/1517

प्र दैवोदासो अग्नि (र्देव इन्द्रो न मज्मना। अनु मातरं पृथिवीं वि वावृते तस्थौ नाकस्य शर्मणि)* (हा)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥१५१७

Veda : Samveda | Mantra No : 1517

In Hindi:

ऋषि : सौभरि: काण्व: | देवता : अग्निः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : तृतीय ऋचा की पूर्वार्चिक में ५१ क्रमाङ्क पर परमात्मा की महिमा के विषय में व्याख्या की गयी थी। यहाँ परमात्मा और राजा दोनों का विषय कहते हैं।

पदपाठ : प्र । दैवोदासः । दैवः । दासः । अग्निः । देवः । इन्द्रः । न । मज्मना । अनु । मातरम् । पृथिवीम् । वि । वावृते । तस्थौ । नाकस्य । शर्मणि॥

पदार्थ : (दैवोदासः) आनन्द का दाता, (देवः) प्रकाशक (अग्निः) अग्रनायक जगदीश्वर वा राजा (इन्द्रः न) सूर्य के समान (मज्मना) बल से (मातरं पृथिवीम्) माता के समान पालन करनेवाली भूमि को (अनु विवावृते) अनुकूलता से पालता है और (नाकस्य) सुख की (शर्मणि) रक्षा में (तस्थौ) उद्यत रहता है ॥३॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥

भावार्थ : जैसे जगदीश्वर प्रजाओं को योगक्षेम प्रदान करता है और भूमि का पालन करता है, वैसे ही राजा भी करे ॥३॥