Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1522

तं त्वा घृतस्नवीमहे चित्रभानो स्वर्दृशम्। देवा आ वीतये वह॥१५२२

Veda : Samveda | Mantra No : 1522

In Hindi:

ऋषि : वसूयव आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : आगे फिर उन्हीं से प्रार्थना की गयी है।

पदपाठ : तम् । त्वा । घृतस्नो । घृत । स्नो । ईमहे । चित्रभानो । चित्र । भानो । स्वर्दृशम् । स्वः । दृशम् । देवान् । आ । वीतये । वह॥

पदार्थ : हे (घृतस्नो) विद्या-रस तथा आनन्द-रस को बहानेवाले, (चित्रभानो) अद्भुत तेजवाले जगदीश्वर वा आचार्य ! (तम्) उन प्रसिद्ध (स्वर्दृशम्) विवेकरूप प्रकाश को दर्शानेवाले (त्वा) आपसे, हम (ईमहे) याचना करते हैं। आप (वीतये) हमारी प्रगति के लिए (देवान्) दिव्य गुणों को (आ वह) प्राप्त कराओ ॥२॥

भावार्थ : परमात्मा की उपासना से और आचार्यकुल में निवास से आनन्दरस, विद्यारस तथा कर्तव्य और अकर्तव्य का प्रकाश और जीवन में प्रगति प्राप्त होती है ॥२॥