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Samveda/1552

अग्न आ याह्यग्निभिर्होतारं त्वा वृणीमहे। आ त्वामनक्तु प्रयता हविष्मती यजिष्ठं बर्हिरासदे॥१५५२

Veda : Samveda | Mantra No : 1552

In Hindi:

ऋषि : भर्गः प्रागाथः | देवता : अग्निः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम मन्त्र में परमात्मारूप अग्नि का आह्वान है।

पदपाठ : अग्ने । आ । याहि । अग्निभिः । होतारम् । त्वा । वृणीमहे । आ । त्वाम् । अनक्तु । प्रयता । प्र । यता । हविष्मती । यजिष्ठम् । बर्हिः । आसदे । आ । सदे॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्रनेता परमात्मन् ! आप (अग्निभिः) तेजों के साथ (आ याहि) आओ। (होतारम्) दाता (त्वा) आपको, हम (वृणीमहे) भजते हैं। (यजिष्ठं त्वाम्) हमारे साथ अतिशय सङ्गम करनेवाले आपको, हमारी (हविष्मती) समर्पणयुक्त (प्रयता) पवित्र प्रज्ञा (बर्हिः) हृदयासन पर (आसदे) बैठने के लिए (अनक्तु) प्रकट करे ॥१॥

भावार्थ : परमेश्वर जब स्तोता के अन्तरात्मा में प्रबल संकल्प, उत्साह, वीरता और आशावाद की अग्नियों के साथ आता है, तब स्तोता के मार्ग से सब विघ्न हट जाते हैं और लक्ष्यप्राप्ति सुनिश्चित हो जाती है ॥१॥