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Samveda/1570

उप त्वा जामयो गिरो देदिशतीर्हविष्कृतः। वायोरनीके अस्थिरन्॥१५७०

Veda : Samveda | Mantra No : 1570

In Hindi:

ऋषि : प्रयोगो भार्गवः पावकोऽग्निर्बार्हस्पत्यो वा गृहपति-यविष्ठौ सहसः पुत्रवान्यतरो वा | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में १३ क्रमाङ्क पर परमात्मा की महिमा के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ वेद-वाणियों का वर्णन करते हैं।

पदपाठ : उप । त्वा । जामयः । गिरः । देदिशतीः । हविष्कृतः । हविः । कृतः । वायोः । अनीके । अस्थिरन्॥

पदार्थ : हे अग्ने ! हे प्रकाशमय जगदीश्वर ! (हविष्कृतः) आत्मसमर्पणकर्ता उपासक की (जामयः) बहिनों के समान हितकारिणी, (त्वा देदिशतीः) आपके गुणों का निर्देश करती हुई (गिरः) वेदवाणियाँ (वायोः) प्राणप्रिय आपके (अनीके) समीप (उप अस्थिरन्) उपस्थित हो रही हैं ॥अन्यत्र कहा भी है—ऋचाएँ उसी अविनाशी सर्वोच्च परमेश्वर का प्रतिपादन करती हैं, जिसमें सब दिव्यगुण अवस्थित हैं। जिसने उसे नहीं जाना, उसे वेद से क्या लाभ ? जो उसे जान लेते हैं, वे मोक्ष पद में समासीन हो जाते हैं (ऋ० १।१६४।३९) ॥१॥

भावार्थ : जो परमेश्वर अग्नि के समान स्तोता के हृदय में दिव्य ज्योति प्रज्वलित कर देता है और वायु के समान उसे धौंकता रहता है, उसी की महिमा को सब वेद एक स्वर से गाते हैं ॥१॥