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Samveda/1571

यस्य त्रिधात्ववृतं बर्हिस्तस्थावसन्दिनम्। आपश्चिन्नि दधा पदम्॥१५७१

Veda : Samveda | Mantra No : 1571

In Hindi:

ऋषि : प्रयोगो भार्गवः पावकोऽग्निर्बार्हस्पत्यो वा गृहपति-यविष्ठौ सहसः पुत्रवान्यतरो वा | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में अन्तरिक्ष के महत्त्व द्वारा परमात्मा का महत्त्व वर्णित है।

पदपाठ : यस्य । त्रिधातु । त्रि । धातु । अवृतम् । अ । वृतम् । बर्हिः । तस्थौ । असन्दिनम् । अ । सन्दिनम् । आपः । चित् । नि । दध । पदम्॥

पदार्थ : (यस्य) जिस जगदीश्वर का (त्रिधातु) वायु, बिजली और सूर्य, इन तीनों धातुओं से युक्त, (अवृतम्) न समेटा हुआ अर्थात् विस्तृत (बर्हिः) अन्तरिक्ष (असन्दिनम्) खुला हुआ (तस्थौ) स्थित है, जिस अन्तरिक्ष में (आपः चित्) मेघ-जल भी (पदम्) स्थिति को (नि दध) धारण किये हुए हैं। [हे मनुष्यो ! उसकी महिमा को तुम जानो] ॥२॥

भावार्थ : परमेश्वर से रचे हुए अन्तरिक्ष आदि की महिमा से परमेश्वर की ही महिमा प्रकाशित होती है ॥२॥