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Samveda/1573

अभि त्वा पूर्वपीतय इन्द्र स्तोमेभिरायवः। समीचीनास ऋभवः समस्वरन्रुद्रा गृणन्त पूर्व्यम्॥१५७३

Veda : Samveda | Mantra No : 1573

In Hindi:

ऋषि : मेध्यातिथिः काण्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में २५६ क्रमाङ्क पर परमात्मा की स्तुति के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ गुरु-शिष्य के विषय को कहते हैं।

पदपाठ : अभि । त्वा । पूर्वपीतये । पूर्व । पीतये । इन्द्र । स्तोमेभिः । आयवः । समीचीनासः । सम् । ईचीनासः । ऋभवः । ऋ । भवः । सम् । अस्वरन् । रुद्राः । गृणन्त । पूर्व्यम्॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) विद्या के ऐश्वर्य से युक्त आचार्य ! (पूर्वपीतये) श्रेष्ठ विद्यारस के पान के लिए (आयवः) विद्यार्थी जन (स्तोमेभिः) स्तोत्रों द्वारा (त्वा) आपसे (अभि) अभ्यर्थना कर रहे हैं। आपके ही निर्देशन में (ऋभवः) मेधावी छात्र (समीचीनासः) आपस में मिलकर (समस्वरन्) वेदमन्त्रों का उच्चारण करते हैं और (रुद्राः) प्राणवान् ब्रह्मचारीगण (पूर्व्यम्) पूर्व कवियों वा ऋषियों से रचे हुए स्तोत्र आदि काव्य का भी (गृणन्त) गान करते हैं ॥१॥

भावार्थ : सुयोग्य ब्रह्मवेत्ता गुरुओं से सुयोग्य शिष्यों द्वारा पढ़ी हुई भौतिक विद्या और ब्रह्मविद्या फलदायक होती है ॥१॥