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Samveda/1576

इन्द्राग्नी नवतिं पुरो दासपत्नीरधूनुतम्। साकमेकेन कर्मणा॥१५७६

Veda : Samveda | Mantra No : 1576

In Hindi:

ऋषि : विश्वामित्रो गाथिनः | देवता : इन्द्राग्नी | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : आगे फिर उसी विषय में कहते हैं।

पदपाठ : इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । नवतिम् । पुरः । दासपत्नीः । दास । पत्नीः । अधूनतम् । साकम् । एकेन । कर्मणा॥

पदार्थ : हे (इन्द्राग्नी) जीवात्मन् और परमात्मन् ! (एकेन) अद्वितीय (कर्मणा) पुरुषार्थ के (साकम्) साथ (दासपत्नीः) काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर रूप दास जिनके स्वामी हैं, ऐसी (नवतिं पुरः) नव्वे शत्रु-नगरियों को—पाँच ज्ञानेन्द्रियों के विषय, पाँच कर्मेन्द्रियों के विषय और उन-उनमें आनेवाले व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व, अनवस्थितत्व—ये नौ योगमार्ग के विघ्न इस प्रकार नव्वे हो जाते हैं, वे ही नव्वे शत्रु-नगरियाँ हैं, उन्हें तुम दोनों (अधूनुतम्) कँपा डालते हो ॥२॥

भावार्थ : परमात्मा की मित्रता पाकर और जीवात्मा को उद्बोधन देकर योगाभ्यास में संलग्न मनुष्य को सब योग-विघ्नों को दूर करके योगमार्ग में सफलता पाना योग्य है ॥२॥