Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1580

पौरो अश्वस्य पुरुकृद्गवामस्युत्सो देव हिरण्ययः। न किर्हि दानं परि मर्धिषत्वे यद्यद्यामि तदा भर (चु)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१५८०

Veda : Samveda | Mantra No : 1580

In Hindi:

ऋषि : भर्गः प्रागाथः | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : पञ्चमः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा की स्तुति और उससे प्रार्थना है।

पदपाठ : पौरः । अश्वस्य । पुरुकृत् । पुरु । कृत् । गवाम् । असि । उत्सः । उत् । सः । देव । हिरण्ययः । न । किः । हि । दानम् । परिमर्द्धिषत् । परि । मर्द्धिषत् । त्वेइति । यद्यत् । यत् । यत् । यामि । तत् । आ । भर॥

पदार्थ : हे इन्द्र ! हे परमैश्वर्यशाली जगदीश्वर ! आप (अश्वस्य) सूर्य वा प्राण को (पौरः) पूर्ण करनेवाले (गवाम्) सूर्यकिरणों, पृथिवियों, इन्द्रियों वा धेनुओं की (बहुकृत्) बहुतायत करनेवाले (असि) हो। हे (देव) दान आदि गुणों से युक्त ! आप सम्पदाओं के (हिरण्ययः) ज्योतिर्मय (उत्सः) स्रोत हो। (त्वे) आपमें विद्यमान (दानम्) दान के गुण को (न किः हि) कोई भी नहीं (परि मर्धिषत्) नष्ट कर सकता है। इसलिए मैं (यत् यत्) जो-जो (यामि) आपसे माँगता हूँ (तत्) वह (आभर) मुझे प्रदान कर दो ॥२॥

भावार्थ : परमात्मा की कृपा से और अपने पुरुषार्थ से मनुष्य सारी दिव्य और लौकिक सम्पदा प्राप्त कर सकता है ॥२॥