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Samveda/1583

यो विश्वा दयते वसु होता मन्द्रो जनानाम्। मघोर्न पात्रा प्रथमान्यस्मै प्र स्तोमा यन्त्वग्नये॥१५८३

Veda : Samveda | Mantra No : 1583

In Hindi:

ऋषि : सौभरि: काण्व: | देवता : अग्निः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ४४ क्रमाङ्क पर परमात्मा की स्तुति के विषय में की जा चुकी है। यहाँ एक-साथ परमात्मा और आचार्य दोनों को लक्ष्य करके कहते हैं।

पदपाठ : यः । विश्वा । दयते । वसु । होता । मन्द्रः । जनानाम् । मघोः । न । पात्रा । प्रथमानि । अस्मै । प्र । स्तोमाः । यन्तु । अग्नये॥

पदार्थ : (होता) ब्रह्माण्ड-यज्ञ वा शिक्षा-यज्ञ का कर्ता, (जनानाम्) मनुष्यों को (मन्द्रः) आनन्द देनेवाला (यः) जो परमात्मा वा आचार्य (विश्वा वसु) सब आध्यात्मिक धनों को वा विद्या-धनों को (ददाति) देता है, (अस्मै अग्नये) ऐसे अग्रनायक परमात्मा वा आचार्य के लिए (प्रथमानि) श्रेष्ठ (मधोः पात्रा न) मधुपूर्ण पात्रों के समान (स्तोमाः) धन्यवाद के वचन (प्र यन्तु) पहुँचें ॥१॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥

भावार्थ : जैसे परमेश्वर पुरुषार्थी को भौतिक और आध्यात्मिक धन प्रदान करता है, वैसे ही आचार्य शिष्यों को विद्या-धन देता है, इसलिए वे दोनों सबके द्वारा अभिनन्दन करने योग्य हैं ॥१॥