Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1584

अश्वं न गीर्भी रथ्यसुदानवो मर्मृज्यन्ते देवयवः। उभे तोके तनये दस्म विश्पते पर्षि राधो मघोनाम् (पु)।।॥१५८४

Veda : Samveda | Mantra No : 1584

In Hindi:

ऋषि : सौभरि: काण्व: | देवता : अग्निः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : पञ्चमः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा और आचार्य का विषय है।

पदपाठ : अश्वम् । न । गीर्भिः । रथ्यम् । सुदानवः । सु । दानवः । मर्मृज्यन्ते । देवयवः । उभेइति । तोकेइति । तनये । दस्म । विश्पते । पर्षि । राधः । मघोनाम्॥

पदार्थ : प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (देवयवः) दिव्य गुणों की कामनावाले (सुदानवः) भली-भाँति आत्मसमर्पण करनेवाले उपासक (रथ्यम् अश्वं न) रथ को खींचनेवाले घोड़े के समान (रथ्यम्) ब्रह्माण्ड-रथ को खींचनेवाले परमात्मा को (गीर्भिः) स्तुति-वाणियों से (मर्मृज्यन्ते) अलङ्कृत करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि हे (दस्म) दर्शनीय (विश्पते) प्रजापति परमात्मन् ! आप हमारे (तोके तनये) पुत्र-पौत्रों (उभे) दोनों में (मघोनाम्) धनियों के (राधः) धन के समान (राधः) अध्यात्मधन को, भौतिक धन को और सफलता को (पर्षि) सींचो, बहुत रूप में प्रदान करो ॥द्वितीय—आचार्य के पक्ष में। (देवयवः) अपने पुत्रों को विद्वान् बनाना चाहते हुए (सुदानवः) उत्तम दानी गृहस्थ लोग (रथ्यम् अश्वं न) रथ को खींचनेवाले घोड़े के समान (रथ्यम्) विद्या-रूप रथ को चलानेवाले आचार्य को (गीर्भिः) प्रशंसा-वचनों से (मर्मृज्यन्ते) अलङ्कृत करते हैं और कहते हैं कि हे (दस्म) दोषों को दूर करनेवाले, (विश्पते) शिष्य रूप प्रजाओं के पालक आचार्य ! आप हमारे (तोके तनये) पुत्र और पौत्र (उभे) दोनों में (मघोनाम्) विद्या-धन के धनी गुरुजनों के (राधः) विद्यारूप धन को (पर्षि) सींचो, बहुत रूप में प्रदान करो ॥२॥इस मन्त्र में उपमा और श्लेष अलङ्कार हैं ॥२॥

भावार्थ : परमात्मा और आचार्य की कृपा से हमारी सन्तानें परमेश्वर-पूजक, पुरुषार्थी, विद्यावान् और धार्मिक हों ॥२॥इस खण्ड में गुरु-शिष्य, परमात्मा-जीवात्मा और मनुष्य के उद्बोधन के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥सोलहवें अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥