Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1589

विश्वकर्मन्हविषा वावृधानः स्वयं यजस्व तन्व स्वा हि ते। मुह्यन्त्वन्ये अभितो जनास इहास्माकं मघवा सूरिरस्तु (ला)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥१५८९

Veda : Samveda | Mantra No : 1589

In Hindi:

ऋषि : विश्वकर्मा भौवनः | देवता : विश्वकर्मा | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : इस एक ऋचावाले सूक्त में अपने अन्तरात्मा को उद्बोधन दिया गया है।

पदपाठ : विश्वकर्मन् । विश्व । कर्मन । हविषा । वावृधानः । स्वयम् । यजस्व । तन्वम् । स्वा । हि । ते । मुह्यन्तु । अन्ये । अन् । ये । अभितः । जनासः । इह । अस्माकम् । मघवा । सूरिः । अस्तु॥

पदार्थ : हे (विश्वकर्मन्) शारीरिक सब कर्मों के कर्त्ता जीव ! (हविषा) सद्गुणों के आधान द्वारा (वावृधानः) समृद्ध हुआ तू (स्वयम्) अपने आप ही (तन्वम्) शरीर को (यजस्व) यज्ञ-कर्मों में नियुक्त कर, (हि) क्योंकि, वह (ते) तेरी (स्वा) अपनी है, उस पर तेरा अधिकार है। (अभितः) सब ओर स्थित (अन्ये) दूसरे (जनासः) उत्पन्न बाह्य तथा आन्तरिक शत्रु (मुह्यन्तु) मोह को प्राप्त हो जाएँ। (मघवा) ऐश्वर्यशाली जगदीश्वर (इह) इस जगत् में (अस्माकम्) हमारा (सूरिः) प्रेरक (अस्तु) होवे ॥१॥

भावार्थ : जीव का यह कर्तव्य है कि वह अपने देह को शुभकर्मों में लगाकर परमात्मा की पूजा करते हुए अभ्युदय और निःश्रेयस प्राप्त करे ॥१॥