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Samveda/1590

अया रुचा हरिण्या पुनानो विश्वा द्वेषासि तरति सयुग्वभिः सूरो न सयुग्वभिः। धारा पृष्ठस्य रोचते पुनानो अरुषो हरिः। विश्वा यद्रूपा परियास्यृक्वभिः सप्तास्येभिर्ऋक्वभिः॥१५९०

Veda : Samveda | Mantra No : 1590

In Hindi:

ऋषि : अनानतः पारुच्छेपिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : अत्यष्टिः | स्वर : गान्धारः

विषय : ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ४६३ क्रमाङ्क पर जीवात्मा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ परमात्मा का विषय वर्णित करते हैं।

पदपाठ : अया । रुचा । हरिण्या । पुनानः । विश्वा । द्वेषासि । तरति । सयुग्वभिः । स । युग्वभिः । सूरः । न । सयुग्वभिः । स । युग्वभिः । धारा । पृष्ठस्य । रोचते । पुनानः । अरुषः । हरिः । विश्वा । यत् । रुपा । परियासि । परि । यासि । ऋकभिः । सप्तायेभिः । सप्त । आस्येभिः । ऋकभिः॥

पदार्थ : यह सोम नामक परमेश्वर (अया) इस (हरिण्या) कष्टों को हरनेवाली (रुचा) कान्ति से (पुनानः) पवित्रता देता हुआ (सयुग्वभिः) सहयोगी मन, बुद्धि आदियों द्वारा उपासक के (विश्वा द्वेषांसि) सब दोषों को (तरति) दूर कर देता है। कैसे ? (सूरः न) सूर्य जैसे (सयुग्वभिः) सहयोगी किरणों द्वारा (विश्वा द्वेषांसि) सब अन्धकारों को (तरति) दूर करता है। (पृष्ठस्य) आनन्द सींचनेवाले परमेश्वर की (धारा) पवित्रता की रस-धार (रोचते) मन को भाती है। हे परमेश्वर ! (अरुषः) तेजस्वी, (हरिः) दुःखहर्ता आप, उस धारा से (पुनानः) पवित्र करते हो, (यत्) जब (ऋक्वभिः) वेदपाठियों से तथा (सप्तास्यैः ऋक्वभिः) गायत्र्यादि सात छन्दोंवाले वेदमन्त्रों से गाये जाते हुए आप (विश्वा रूपा) विभिन्न रूपों को (परि यासि) प्राप्त करते हो, अर्थात् विभिन्न रूपों में वर्णित किये जाते हो ॥१॥यहाँ उपमालङ्कार और यमक है ॥१॥

भावार्थ : जैसे सूर्य अन्धकारों को दूर करता है, वैसे ही जगदीश्वर पुरुषार्थी उपासकों के दुःख, दुर्व्यसन आदि को दूर करता है ॥१॥