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Samveda/1591

प्राचीमनु प्रदिशं याति चेकितत्स रश्मिभिर्यतते दर्शतो रथो दैव्यो दर्शतो रथः। अग्मन्नुक्थानि पौस्येन्द्रं जैत्राय हर्षयन्। वज्रश्च यद्भवथो अनपच्युता समत्स्वनपच्युता॥१५९१

Veda : Samveda | Mantra No : 1591

In Hindi:

ऋषि : अनानतः पारुच्छेपिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : अत्यष्टिः | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र में यह कहा गया है कि परमात्मा की उपासना से जीव क्या प्राप्त करता है।

पदपाठ : प्राचीम् । अनु । प्रदिशम् । प्र । दिशम् । याति । चेकितत् । सम् । रश्मिभिः । यतते । दर्शतः । रथः । दैव्यः । दर्शतः । रथः । अग्मन् । उक्थानि । पौस्या । इन्द्रम् । जैत्राय । हर्षयन् । वज्रः । च । यत् । भवथः । अनपच्युता । अन् । अपच्युता । समत्सु । स । मत्सु । अनपच्युता । अन् । अपच्युता॥

पदार्थ : परमेश्वर की मित्रता प्राप्त करके जीव (चेकितत्) विज्ञानवान् होता हुआ (प्राचीं प्रदिशम्) प्रकृष्ट दिशा की ओर (अनुधावति) अग्रसर होने लगता है। (दर्शतः) द्रष्टा वह (रथः) रथ के समान वेगवान् होता हुआ (रश्मिभिः) तेज की किरणों से (संयतते) संयुक्त हो जाता है। इसका (रथः) देहरूप रथ (दैव्यः) सज्जनों का हित करनेवाला और (दर्शतः) दर्शनीय हो जाता है। शुभगुणप्रेरक, सोम परमात्मा की उपासना से (उक्थानि) प्रशंसनीय (पौंस्या) बल (इन्द्रम्) जीवात्मा को (अग्मन्) प्राप्त होते हैं और उसे (जैत्राय) विजय के लिए (हर्षयन्) उत्साहित करते हैं, (यत्) क्योंकि, हे सद्गुणों की प्रेरणा करनेवाले जगदीश्वर ! आप (वज्रः च) और आपका व्रजतुल्य दण्ड देने का सामर्थ्य दोनों (अनपच्युता) अडिग होते हुए (समत्सु) देवासुरसङ्ग्रामों में (अनपच्युता) अटूट बलवाले (भवथः) होते हो ॥२॥

भावार्थ : परमेश्वर का सखा शत्रुओं से अपराजित होता हुआ सदा ही उत्कर्ष प्राप्त करता है ॥२॥