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Samveda/1598

मही मित्रस्य साधथस्तरन्ती पिप्रती ऋतम्। परि यज्ञं (नि?)षेदथुः (का)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१५९८

Veda : Samveda | Mantra No : 1598

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : द्यावापृथिवी | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब दोनों के आश्रय से योगसिद्धि होने का वर्णन करते हैं।

पदपाठ : महीइति । मित्रस्य । मि । त्रस्य । साधयः । तरन्तीइति । पिप्रतीइति । ऋतम् । परि । यज्ञम् । नि । सेदधुः॥

पदार्थ : हे आत्मा और बुद्धि ! (मही) महान् तुम दोनों (मित्रस्य) मित्र उपासक की (साधथः) योगसाधना को पूर्ण करते हो। (तरन्ती) योग के विघ्नों को पार करते हुए, (ऋतम्) सत्य को (पिप्रती) पूर्ण करते हुए तुम दोनों (यज्ञम्) योगी के योग-यज्ञ को (परि निषेदथुः) चारों ओर से व्याप्त करते हो ॥३॥

भावार्थ : जीवात्मा के बिना बुद्धि और बुद्धि के बिना जीवात्मा योग सिद्ध नहीं कर सकते। दोनों आपस में मिलकर ही योगयज्ञ की पूर्ति करते हैं ॥३॥