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Samveda/1599

अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भधिम्। वचस्तच्चिन्न ओहसे॥१५९९

Veda : Samveda | Mantra No : 1599

In Hindi:

ऋषि : शुनः शेप आजीगर्तिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में १८३ क्रमाङ्क पर परमेश्वर को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ उपासक को सम्बोधन करते हैं।

पदपाठ : अयम् । उ । ते । सम् । अतसि । कपोतः । इव । गर्भधिम् । गर्भ । धिम् । वचः । तत् । चित् । नः । ओहसे॥

पदार्थ : हे उपासक ! (अयम् उ) यह इन्द्र नामक परमेश्वर (ते) तेरा ही है, जिसे तू (समतसि) भली-भाँति प्राप्त करता है। कैसे प्राप्त करता है ? (कपोतः इव) जैसे कबूतर (गर्भधिम्) नन्हे-नन्हे शिशुओं को धारण करनेवाले अपने घोंसले को प्राप्त करता है। (तत् चित्) इस (नः) हमारे (वचः) वचन पर, हे उपासक ! तू (ओहसे) विचार कर ॥१॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥

भावार्थ : परमेश्वर के साथ अन्तरङ्ग सम्बन्ध स्थापित करके उपासक को परमेश्वर के गुण अपने में धारण करने का प्रयत्न करना चाहिए ॥१॥