Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1601

ऊर्ध्वस्तिष्ठा न ऊतयेऽस्मिन्वाजे शतक्रतो। समन्येषु ब्रवावहै (ह)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥१६०१

Veda : Samveda | Mantra No : 1601

In Hindi:

ऋषि : शुनः शेप आजीगर्तिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब परमेश्वर को संबोधन करते हैं।

पदपाठ : सू । नृता । ऊर्ध्वः । तिष्ठ । नः । ऊतये । अस्मिन् । वाजे । शतक्रतो । शत । क्रतो । सम् । अन्येषु । अन् । येषु । ब्रवावहै॥

पदार्थ : हे (शतक्रतो) अनन्त ज्ञानी और अनन्त कर्मों को करनेवाले इन्द्र परमात्मन् ! आप (अस्मिन् वाजे) इस देवासुरसङ्ग्राम में (नः ऊतये) हमारी रक्षा के लिए (ऊर्ध्वः) सजग (तिष्ठ) रहो।(अन्येषु) दूसरे अवसरों पर भी, आप और मैं (संब्रवावहै)आपस में अन्तरङ्ग संलाप किया करें ॥३॥

भावार्थ : जब-जब बाहरी या आन्तरिक देवासुर सङ्ग्राम उपस्थित होते हैं, तब-तब परमेश्वर-विश्वास को अपने अन्दर बलवान् करके, आत्मोद्बोधन पाकर सब विघ्नों को विफल करके विजय पानी चाहिए ॥३॥