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Samveda/1609

यस्यायं विश्व आर्यो दासः शेवधिपा अरिः। तिरश्चिदर्ये रुशमे पवीरवि तुभ्येत्सो अज्यते रयिः॥१६०९

Veda : Samveda | Mantra No : 1609

In Hindi:

ऋषि : वालखिल्यः | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम मन्त्र में इन्द्र परमेश्वर का वर्णन है।

पदपाठ : यस्य । अयम् । विश्वः । आर्यः । दासः । शेवधिपाः । शेवधि । पाः । अरिः । तिरः । चित् । अर्ये । रुशमे । पवीरवि । तुभ्य । इत् । सः । अज्यते । रयिः॥ ।

पदार्थ : (यस्य) जिस तुझ इन्द्र परमात्मा का (अयम्) यह प्रत्यक्ष दिखाई देता हुआ (विश्वः) सम्पूर्ण संसार है, जो तू (आर्यः)श्रेष्ठ, (दासः) दुष्टों का क्षय करनेवाला, (शेवधिपाः) निधियों का रक्षक और (अरिः) समर्थ है और जो तू (अर्ये) जीवनाधार पवन में, (रुशमे) चमकीले सूर्य में तथा(पवीरवि) बिजली-युक्त बादल में (तिरः चित्) विद्यमान है, ऐसे (तुभ्य इत्) तेरे लिए ही (सः) वह जगत् में सर्वत्र बिखरा हुआ (रयिः) धन (अज्यते) समर्पित है ॥१॥

भावार्थ : विश्व का सम्राट्, श्रेष्ठ, सज्जनों का रक्षक, दुष्टों का दलन करनेवाला, भूगर्भ में निहित निधियों का रक्षक, सब कुछ करने में समर्थ, सर्वान्तर्यामी जो परमेश्वर है, उसी का सब धन है, इस हेतु से ईश्वरापर्ण-बुद्धि से उसका सेवन करना चाहिए ॥१॥