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Samveda/1620

इन्द्रं वो विश्वतस्परि हवामहे जनेभ्यः। अस्माकमस्तु केवलः॥१६२०

Veda : Samveda | Mantra No : 1620

In Hindi:

ऋषि : मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम मन्त्र में इन्द्र नाम से परमात्मा का विषय है।

पदपाठ : इन्द्रम् । वः । विश्वतः । परि । हवामहे । जनेभ्यः । अस्माकम् । अस्तु । केवलः॥

पदार्थ : हे साथियो ! (विश्वतः परि) सबसे ऊपर, हम (इन्द्रम्) विघ्ननाशक, परमैश्वर्यवान् परमात्मा को (जनेभ्यः वः) आप प्रजाजनों के लिए (हवामहे) पुकारते हैं। वह (अस्माकम्)हम श्रोताओं का (केवलः) अद्वितीय सखा (अस्तु) होवे ॥१॥

भावार्थ : भले ही माता, पिता, राजा आदि हमें सुख देनेवाले होते हैं, परन्तु सदा सहायक, सदा अशरण-शरण, सदा धैर्यप्रदाता सखा तो जगदीश्वर ही है ॥१॥