Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1621

स नो वृषन्नमुं चरु सत्रादावन्नपा वृधि। अस्मभ्यमप्रतिष्कुतः॥१६२१

Veda : Samveda | Mantra No : 1621

In Hindi:

ऋषि : मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब परमात्मा से प्रार्थना करते हैं।

पदपाठ : सः । नः । वृषन् । अमुम् । चरुम् । सत्रादावन् । सत्रा । अप । वृधि । अस्मभ्यम् । अप्रतिष्कुतः । अ । प्रतिकुष्कुतः॥

पदार्थ : हे (वृषन्) सुखों की वर्षा करनेवाले, (सत्रादावन्) एक साथ दान देनेवाले, सत्य के प्रेरक वा सृष्टियज्ञ के सम्पादक जगदीश्वर ! (अप्रतिष्कुतः) अविचल (सः) वह आप(अस्मभ्यम्) आपकी आज्ञा में और पुरुषार्थ में वर्तमान हम उपासकों के लिए (अमुं चरुम्) सूर्य के प्रतिबन्धक मेघ के समान इस मोक्षमार्ग में रुकावट डालनेवाले अविद्या, दुराचार आदि को (अपावृधि) दूर कर दो ॥२॥

भावार्थ : जैसे सूर्य अपने प्रकाश के सञ्चार में बाधा डालनेवाले मेघ रूप कपाट को खोलकर भूमण्डल को प्रकाशित करता है, वैसे ही जगदीश्वर हमारे मोक्ष में बाधक अविद्या, दुष्कर्म आदि को हटाकर हमें मोक्ष प्राप्त कराते हैं ॥२॥