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Samveda/1630

वायविन्द्रश्च शुष्मिणा सरथशवसस्पती। नियुत्वन्ता न ऊतय आ यातसोमपीतये (ता)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१६३०

Veda : Samveda | Mantra No : 1630

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्रवायू | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : आगे फिर उसी विषय का वर्णन है।

पदपाठ : वायो । इन्द्रः । च । शुष्मिणा । सरथम् । स । रथम् । शवसः । पतीइति । नियुत्वन्ता । नि । युत्वन्ता । नः । ऊतये । आ । यातम् । सोमपीतये । सोम । पीतये॥

पदार्थ : हे (वायो) प्राण ! तू (इन्द्रः च) और जीवात्मा (शुष्मिणा) बलवान् (शवसः पती) बल के रक्षक और (नियुत्वन्ता) सदा कार्य-तत्पर रहते हुए (नः ऊतये) हमारी रक्षा के लिए(सरथम्) एक ही देह-रथ पर चढ़कर (सोमपीतये) शान्त रस के पानार्थ (आयातम्) आओ ॥३॥

भावार्थ : जीवात्मा प्राण के ही साथ देह में आता है और उसी के साथ जीवन में सब कार्य सिद्ध करता हुआ योगाभ्यास द्वारा शान्ति प्राप्त करता है ॥३॥