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Samveda/1631

अध क्षपा परिष्कृतो वाजाअभि प्र गाहसे। यदी विवस्वतो धियो हरिहिन्वन्ति यातवे॥१६३१

Veda : Samveda | Mantra No : 1631

In Hindi:

ऋषि : रेभसूनू काश्यपौ | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अब परमात्मा और जीवात्मा का विषय वर्णित करते हैं।

पदपाठ : अध । क्षपा । परिष्कृतः । परि । कृतः । वाजान् । अभि । प्र । गाहसे । यदि । विवस्वतः । वि । वस्वतः । धियः । हरिम् । हिन्वन्ति । यातवे॥

पदार्थ : हे मानव ! (यदि) जब (विवस्वतः) तमोगुणों को हटानेवाले परमेश्वर की (धियः) प्रज्ञाएँ (हरिम्) तुझ मनुष्य को (यातवे) पुरुषार्थ करने के लिए (हिन्वन्ति) प्रेरित करती हैं, तब (क्षपा)परमेश्वर की दोष क्षीण करने की शक्ति से (परिष्कृतः)संस्कृत हुआ तू (वाजान्) विविध ऐश्वर्यों में (अभि प्र गाहसे) अवगाहन अर्थात् रमण करने लगता है ॥१॥

भावार्थ : आत्मशुद्धि और पुरुषार्थ से ही मनुष्य विविध सम्पदाएँ पा सकते हैं ॥१॥