Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1635

स घा नः सूनुः शवसा पृथुप्रगामा सुशेवः। मीढ्वाअस्माकं बभूयात्॥१६३५

Veda : Samveda | Mantra No : 1635

In Hindi:

ऋषि : शुनः शेप आजीगर्तिः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में फिर परमात्मा और आचार्य का विषय है।

पदपाठ : सः । घ । नः । सूनुः । शवसा । पृथुप्रगामा । पृथु । प्रगामा । सुशेवः । सु । शेवः । मीड्वान् । अस्माकम् । बभूयात्॥

पदार्थ : (सः घ) वह निश्चय ही (सूनुः) शुभ गुण, कर्म, विद्या, आदि का प्रेरक, (पृथुप्रगामा) विस्तृत कर्तव्यमार्ग का उपदेश करनेवाला, (सुशेवः) उत्तम सुख देनेवाला परमेश्वर वा आचार्य (नः) हमें (मीढ़्वान्) विद्या, धन आदि की वर्षाओं से सींचनेवाला (बभूयात्) होवे ॥२॥

भावार्थ : भली-भाँति उपासना किया गया परमेश्वर और भली-भाँति सेवा किया गया आचार्य विद्या, शुभ गुण-कर्म आदि के उपदेश से मनुष्यों को सुखी करते हैं ॥२॥