Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1641

उद्गा आजदङ्गिरोभ्य आविष्कृण्वन्गुहा सतीः। अर्वाञ्चं नुनुदे वलम् (पी)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१६४१

Veda : Samveda | Mantra No : 1641

In Hindi:

ऋषि : गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : आगे फिर उसी विषय को कहा गया है।

पदपाठ : उत् । गाः । आजत् । अङ्गिरोभ्यः । आविः । आ । विः । कृण्वन् । गुहा । सतीः । अर्वाञ्चम् । नुनुदे । बलम्॥

पदार्थ : इन्द्र नामक बलवान् जीवात्मा (अर्वाञ्चम्) अपने सामने आये हुए (वलम्) पूर्व मन्त्र में कह गए आवरण डालनेवाले विघ्न-समूह को (नुनुदे) परे धकेल देता है और (गुहा सतीः) गुफा में छिपी हुई (गाः) अध्यात्म-प्रकाश की किरणों को(अड़्गिरोभ्यः) प्राणायाम के अभ्यासियों के लिए (उद् आजत्) बाहर निकाल लाता है ॥३॥

भावार्थ : जिन विघ्न-जालों से घिरे हुए योगाभ्यासी लोग विवेक-ख्याति के प्रकाश को वा परमात्मा के प्रकाश को नहीं प्राप्त कर पाते उन विघ्नों को प्रयत्नशील जीवात्मा परमात्मा की कृपा से पराजित करके लक्ष्य-प्राप्ति में सफल हो जाता है ॥३॥