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Samveda/1648

नमस्ते अग्न ओजसे गृणन्ति देव कृष्टयः। अमैरमित्रमर्दय॥१६४८

Veda : Samveda | Mantra No : 1648

In Hindi:

ऋषि : विरूप आङ्गिरसः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ११ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ परमात्मा, राजा और योगिराज को सम्बोधन है।

पदपाठ : नमः । ते । अग्ने । ओजसे । गृणन्ति । देव । कृष्टयः । अमैः । अमित्रम् । अ । मित्रम् । अदय॥

पदार्थ : हे (देव) दान आदि गुणों से युक्त (अग्ने) अग्रनायक परमात्मन्,राजन् वा योगिराज ! (ते ओजसे) तुम्हारे बल और प्रताप के लिए(कृष्टयः) मनुष्य (नमः गृणन्ति) नमस्कार करते हैं अर्थात् तुम्हारे बल और प्रताप की प्रशंसा करते हैं। तुम (अमैः) अपने बलों से(अमित्रम्) योग-मार्ग वा जीवन-मार्ग में आते हुए शत्रु को (अर्दय) पीड़ित कर डालो ॥१॥

भावार्थ : पग-पग पर हमारे निर्धारित लक्ष्य में जो विघ्न आते हैं, वे परमेश्वर की प्रेरणा से, राजा की सहायता से और योग-प्रशिक्षक के योग्य प्रशिक्षण से सरलतापूर्वक दूर किये जा सकते हैं ॥१॥