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Samveda/1681

परि त्य हर्यत हरिं (बभ्रुं पुनन्ति वारेण। यो देवान्विश्वाँ इत्परि मदेन सह गच्छति)* (हा)।।[धा. । उ नास्ति । स्व. । ]॥१६८१

Veda : Samveda | Mantra No : 1681

In Hindi:

ऋषि : अम्बरीषो वार्षागिरः ऋजिश्वा भारद्वाजश्च | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : तृतीय ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ५५२ क्रमाङ्क पर जीवात्मा की शुद्धि के विषय में और उत्तरार्चिक में १३२९ क्रमाङ्क पर गुरु-शिष्य के विषय में हो चुकी है। यहाँ मन की शुद्धि का विषय कहते हैं।

पदपाठ : परि । त्यम् । हर्यतम् । हरिम । वभ्रम् । पुनन्ति । वारेण । यः । देवान् । विश्वान । इत् । परि । मदेन । सह । गच्छति॥

पदार्थ : योगाभ्यासी लोग (त्यम्) उस (हर्यतम्) चाहने योग्य, (बभ्रुम्) इन्द्रियों को विषय ग्रहण में सहायता देनेवाले, (हरिम्) ज्ञान के ग्रहण में साधनभूत मन को (वारेण) अशुद्धि-निवारक योगानुष्ठान से (परि पुनन्ति) पवित्र करते हैं, (यः) जो मन (मदेन सह) उत्साह के साथ (विश्वान् देवान् इत्) सभी इन्द्रियों में (परि गच्छति) उन-उनके विषय को ग्रहण कराने के लिए परिव्याप्त होता है, [क्योंकि मन का व्यापार न हो तो इन्द्रियां विषय को ग्रहण नहीं कर सकतीं] ॥३॥

भावार्थ : मनुष्यों का मन यदि दूषित हो तो वह इन्द्रियों को कुमार्ग पर ही ले जाता है। इसलिए अध्यात्म-जीवन के लिए और परमात्मा के दर्शन के लिए उसका शोधन अत्यन्त आवश्यक है ॥३॥