Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1687

तं गूर्धया स्वर्णरं देवासो देवमरतिं दधन्विरे। देव?त्रा हव्यमूहिषे॥१६८७

Veda : Samveda | Mantra No : 1687

In Hindi:

ऋषि : सौभरि: काण्व: | देवता : अग्निः | छन्द : काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती) | स्वर : ऋषभः

विषय : प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में १०९ क्रमाङ्क पर व्याख्या की जा चुकी है। यहाँ परमात्मा की स्तुति का विषय कहते हैं।

पदपाठ : तम् । गूर्धय । स्वरणरम् । स्वः । नरम् । देवासः । देवम् । अरतिम् । दधन्विरे । देवत्रा । हव्यम् । ऊहिषे॥

पदार्थ : हे मानव ! तू (तम्) उस प्रसिद्ध, (स्वर्णरम्) ब्रह्मानन्द वा दिव्य प्रकाश को प्राप्त करानेवाले जगन्नायक परमात्मा की(गूर्धय) अर्चना कर। (देवासः) विद्वान्, दिव्य गुणोंवाले लोग, उस (देवम्) प्रकाशक, (अरतिम्) सबके स्वामी जगदीश्वर को (दधन्विरे) अपने आत्मा में धारण करते हैं। हे ज्योतिर्मय देव ! आप (देवत्रा) विद्वान् जनों में (हव्यम्) देने योग्य सद्गुण-समूह को (ऊहिषे) प्राप्त कराओ ॥१॥

भावार्थ : जो मनुष्य श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभाववाले परमेश्वर की उपासना करते हैं, वे स्वयं भी वैसे हो जाते हैं ॥१॥