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Samveda/1688

विभूतरातिं विप्र चित्रशोचिषमग्निमीडिष्व यन्तुरम्। अस्य मेधस्य सोम्यस्य सोभरे प्रेमध्वराय पूर्व्यम् (या)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥१६८८

Veda : Samveda | Mantra No : 1688

In Hindi:

ऋषि : सौभरि: काण्व: | देवता : अग्निः | छन्द : काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती) | स्वर : पञ्चमः

विषय : आगे फिर परमात्मा की स्तुति का विषय है।

पदपाठ : विभूतरातिम् । विभूत । रातिम् । विप्र । वि । प्र । चित्रशोचिषम् । चित्र । शोचिषम् । अग्निम् । ईडिष्व । यन्तुरम् । अस्य । मेधस्य । सोमयस्य । सोभरे । प्र । ईम । अध्वराय । पूर्व्यम्॥ ।

पदार्थ : हे (सोभरे) भले प्रकार स्तोत्रों का उपहार लानेवाले (विप्र) विद्वन् ! तू (विभूतरातिम्) व्यापक दानवाले, (चित्रशोचिषम्) अद्भुत तेजवाले, (अस्य) इस (सोम्यस्य) ब्रह्मानन्द-रूप सोम के सम्पादक (मेधस्य) उपासना-यज्ञ का (यन्तुरम्) नियन्त्रण करनेवाले, (पूर्व्यम्) सनातन (ईम्) इस (अग्निम्) अग्रनेता जगदीश्वर के (अध्वराय) जीवन-यज्ञ की सफलता के लिए (प्र ईडिष्व) भली-भाँति स्तुति का पात्र बना ॥२॥

भावार्थ : जीवन-यज्ञ की पूर्णता के लिए मनुष्यों को उपासना-यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिए ॥२॥