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Samveda/1690

स मामृजे तिरो अण्वानि मेष्यो मीढ्वांत्सप्तिर्न वाजयुः। अनुमाद्यः पवमानो मनीषिभिः सोमो विप्रेभिर्ऋक्वभिः (तु)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१६९०

Veda : Samveda | Mantra No : 1690

In Hindi:

ऋषि : सप्तर्षयः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : पञ्चमः

विषय : आगे फिर जीवात्मा का विषय है।

पदपाठ : सः । मामृजे । तिरः । अण्वानि । मेष्यः । मीढवान् । सप्तिः । न । वाजयुः । अनुमाद्य । अनु । माद्यः । पवमानः । मनीषिभिः । सोमः । विप्रेभिः । वि । प्रेभिः । ऋकभिः॥

पदार्थ : (वाजयुः) अन्न के इच्छुक (सप्तिः न) घोड़े के समान (वाजयुः) बल और विज्ञान का इच्छुक, (मीढ्वान्) अन्यों पर सुख सींचनेवाला, (मेष्यः) ज्ञान का सिञ्चन करनेवाली वेदवाणी के (अण्वानि) सूक्ष्म विज्ञान-तत्त्वों को (तिरः) प्राप्त करके (पवमानः) स्वयं को पवित्र करता हुआ (सः) वह (सोमः) जीवात्मा (मनीषिभिः) मननशील (ऋक्वभिः) वेदज्ञ (विप्रेभिः) विद्वानों के द्वारा (अनुमाद्यः) हर्षित किये जाने योग्य होता हुआ (मामृजे) श्रेष्ठ गुण-कर्मों से अलङ्कृत किया जाता है ॥२॥यहाँ श्लिष्टोपमा अलङ्कार है ॥२॥

भावार्थ : सब मनुष्यों को चाहिए कि वेद पढ़कर, अपने आत्मा की शक्ति को जान कर, सदाचारी विद्वानों के सङ्ग से अपनी उन्नति निरन्तर किया करें ॥२॥