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Samveda/1691

वयमेनमिदा ह्योऽपीपेमेह वज्रिणम्। तस्मा उ अद्य सवने सुतं भरा नूनं भूषत श्रुते॥१६९१

Veda : Samveda | Mantra No : 1691

In Hindi:

ऋषि : कलिः प्रागाथः | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में २७२ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ जीवात्मा का विषय है।

पदपाठ : वयम् । एनम् । इदा । ह्यः । अपीपेम । इह । वज्रिणम् । तस्मै । उ । अद्य । अ । द्य । सवने । सुतम् । भर । आ । नूनम् । भूषत । श्रुते॥

पदार्थ : (वयम्) हम कर्मयोगी लोगों ने (एनम्) इस (वज्रिणम्) वाणी-रूप वज्र से युक्त अपने अन्तरात्मा को (इदा) इस काल में और(ह्यः) बीते काल में (इह) इस जीवन-यज्ञ में (अपीपेम) बढ़ाया है। हे भाई ! तू भी (तस्मै उ) उस अन्तरात्मा के लिए (अद्य) आज (सवने) कर्मयोग-रूप यज्ञ में (सुतम्) अभिषुत वीर रस को (भर) अर्पित कर। हे साथियो ! तुम सभी (नूनम्) निश्चय ही(श्रुते) शास्त्र-ज्ञान में, अपने अन्तरात्मा को (आभूषत) अलङ्कृत करो ॥१॥

भावार्थ : सब मनुष्यों को चाहिए कि अपने अन्तरात्मा को उद्बोधन देकर वीरता पूर्ण कर्म करें और विविध विद्याओं के ज्ञान का सञ्चय करें ॥१॥