Samveda/1696
क ईं वेद सुते सचा (पिबन्तं कद्वयो दधे। अयं यः पुरो विभिनत्त्योजसा मन्दानः शिप्रयन्धसः)*।।॥१६९६
Veda : Samveda | Mantra No : 1696
In English:
Seer : medhyaatithiH kaaNvaH | Devta : indraH | Metre : bRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : ka ii.m veda sute sachaa pibanta.m kadvayo dadhe . aya.m yaH puro vibhinattyojasaa mandaanaH shiprayandhasaH.1696
Component Words : kaH . iim . veda . sute . sachaa . pibantam . kat . vayaH . dadhe . ayam . yaH . puraH . vibhanatti . vi . bhinatti . ojasaa . mandaanaH . shiprii . andhasaH.
In Hindi:
ऋषि : मेध्यातिथिः काण्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में २९७ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ प्रश्नोत्तर-शैली से उपास्य-उपासक का विषय वर्णित करते हैं।
पदपाठ : कः । ईम् । वेद । सुते । सचा । पिबन्तम् । कत् । वयः । दधे । अयम् । यः । पुरः । विभनत्ति । वि । भिनत्ति । ओजसा । मन्दानः । शिप्री । अन्धसः॥
पदार्थ : (सुते) उपासक के भक्ति-रस के अभिषुत होने पर (सचा) एक साथ (ईम्) इस भक्ति-रस को (पिबन्तम्) पीते हुए इन्द्र परमात्मा को (कः वेद) कौन जानता है? (कत्) कब, वह उपासक के अन्तरात्मा में (वयः) आनन्द-रस को (दधे) रख देता है, यह भी (कः वेद) कौन जानता है? आगे इसका उत्तर दिया गया है—(अयं यः) यह जो (शिप्री) विस्तीर्ण बलवाला उपासक (अन्धसः) आनन्द-रस से (मन्दानः) उत्साह प्राप्त करता हुआ (ओजसा) आत्म-बल से (पुर) आन्तरिक असुरों की किलेबन्दियों को (विभिनत्ति) तोड़-फोड़ देता है, वही जानता है ॥१॥
भावार्थ : कैसे परमात्मा भक्त के भक्तिरस में डूब जाता है और कैसे उपासक भगवान् के ब्रह्मानन्द-रस में डूबता है, इस बात को आत्मसमर्पक भगवद्-भक्त ही जानता है, दूसरा कोई, जिसने भक्त्ति का प्रसाद अनुभव नहीं किया, इस बात को नहीं जान सकता ॥१॥
In Sanskrit:
ऋषि : मेध्यातिथिः काण्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : तत्र प्रथमा ऋक् पूर्वार्चिके २९७ क्रमाङ्के परमात्मविषये व्याख्याता। अत्र प्रश्नोत्तरशैल्या उपास्योपासकविषयमाह।
पदपाठ : कः । ईम् । वेद । सुते । सचा । पिबन्तम् । कत् । वयः । दधे । अयम् । यः । पुरः । विभनत्ति । वि । भिनत्ति । ओजसा । मन्दानः । शिप्री । अन्धसः॥
पदार्थ : (सुते) उपासकस्य भक्तिरसेऽभिषुते सति (सचा) युगपत्(ईम्) एवं भक्तिरसम् (पिबन्तम्) आस्वादयन्तम् इन्द्रं परमात्मानम् (कः वेद) को जानाति ? (कत्) कदा, असौ उपासकस्यान्तरात्मनि (वयः) आनन्दरसम् (दधे) निदधाति इत्यपि (कः वेद) को जानातीति प्रश्नः। तदुत्तरमाह—(अयं यः) य एष (शिप्री) सृप्री, विस्तीर्णबलः उपासकः (अन्धसः) आनन्दरसात् (मन्दानः) उत्साहं प्राप्नुवन् (ओजसा) आत्मबलेन (पुरः) आभ्यन्तराणामसुराणां दुर्गपङ्क्तीः(विभिनत्ति) विदारयति, स एव जानातीति ॥१॥
भावार्थ : कथं परमात्मा भक्तस्य भक्तिरसे निमग्नो जायते कथं चोपासको भगवतो ब्रह्मानन्दरसे इति कृतात्मसमर्पणो भगवद्भक्त एव जानाति, नान्यः कश्चिदननुभूतभक्तिप्रसादो जनः ॥१॥
टिप्पणी:१. ऋ० ८।३३।७, अथ० २०।५३।१; ५७।११। साम० २९७ ऋषिः मेधातिथिः।