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Samveda/1742

सा नो अद्याभरद्वसुकव्युच्छा दुहितर्दिवः। यो व्यौच्छः सहीयसि सत्यश्रवसि वोय्ये सुजाते अश्वसूनृते (तु)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१७४२

Veda : Samveda | Mantra No : 1742

In Hindi:

ऋषि : सत्यश्रवा आत्रेयः | देवता : उषाः | छन्द : पंक्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : आगे फिर उसी विषय को कहते है।

पदपाठ : सा । नः । अद्य । अ । द्य । आभरद्वसुः । आभरत् । वसुः । वि । उच्छ । दुहितः । दिवः । या । उ । व्यौच्छः । वि । औच्छः । सहीयसि । सत्यश्रवसि । सत्य । श्रवसि । वाय्ये । सुजाते । सु । जाते । अश्वसूनृते । अश्व । सूनृते॥ ।

पदार्थ : हे (सुजाते) सुप्रसिद्ध, (अश्वसूनृते) व्यापक प्रिय सत्य वेदवाणीवाली, (दिवः दुहितः) दिव्यप्रकाश को दुह कर देनेवाली जगन्माता ! (आभरद्वसुः) दिव्यधनों को लानेवाली (सा) वह तू (अद्य) आज (नः) हमारे लिए (व्युच्छ) तमोगुण वा अविद्या के अन्धकार को दूर करके विवेकख्याति का प्रकाश फैला, (या उ) जो तू (सहीयसि) अति सहनशील, (सत्यश्रवसि) सत्य यशवाले, (वाय्ये) सत्सङ्ग के लिए प्राप्तव्य किसी महापुरुष में (व्यौच्छः) प्रकाश उत्पन्न करती है ॥३॥

भावार्थ : जगदीश्वरी माँ जैसे महापुरुषों के हृदय में प्रकाश उत्पन्न करती है, वैसे ही हमें भी दिव्य प्रकाश से अनुगृहीत करे ॥३॥