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Samveda/1743

प्रति प्रियतम रथं वृषणं वसुवाहनम्। स्तोता वामश्विनावृषि स्तोमेभिर्भूषति प्रति माध्वी मम श्रुत हवम्॥१७४३

Veda : Samveda | Mantra No : 1743

In Hindi:

ऋषि : अवस्युरात्रेयः | देवता : अश्विनौ | छन्द : पंक्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ४१८ क्रमाङ्क पर अध्यात्म विषय तथा शिल्प विषय में व्याख्यात की जा चुकी है। यहाँ योगाभ्यास का विषय कहते हैं।

पदपाठ : प्रति । प्रियतमम् । रथम् । वृषनम् । वसुवाहनम् । वसु । वाहनमन् । स्तोता । वाम् । अश्विनौ । ऋषिः । स्तोमेभिः । भूषति । प्रति । माध्वीइति । मम् । श्रुतम् । हवम्॥

पदार्थ : हे (अश्विनौ) योगशास्त्र के अध्यापक और योगक्रिया के प्रशिक्षक ! (प्रियतमम्) अतिशय प्रिय, (वृषणम्) बलवान्, (वसुवाहनम्) निवासक मन, प्राण, इन्द्रियों आदि से चलाये जानेवाले (रथम्) आत्मा से अधिष्ठित शरीर-रथ को (प्रति) लक्ष्य करके अर्थात् अध्यात्म और शरीर-योग का प्रशिक्षण देने के लिए (स्तोता) तुम्हारा प्रशंसक (ऋषिः) तत्त्वदर्शी आचार्य (स्तोमेभिः) प्रशंसा-वचनों से (वाम्) तुम दोनों को (प्रतिभूषति) अलंकृत कर रहा है अर्थात् तुम्हारी प्रशंसा कर रहा है। हे (माध्वी) प्राणों की मधुविद्या जाननेवालो ! तुम (मम) मुझ योग-प्रशिक्षण चाहनेवाले की (हवम्) पुकार को (श्रुतम्) सुनो ॥१॥

भावार्थ : जो योग-प्रशिक्षण पाने के इच्छुक हों, उन्हें चाहिए कि वे योगकला में कुशल, प्राणविद्या के ज्ञाता योगशास्त्र पढ़ानेवाले और योग-क्रियाओं का प्रशिक्षण देनेवाले के पास जाकर अष्टाङ्गयोग की विधि से योगाभ्यास करके सब दुःखों से मुक्ति प्राप्त करें ॥१॥