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Samveda/1756

उदपप्तन्नरुणा भानवो वृथा स्वायुजो अरुषीर्गा अयुक्षत। अक्रन्नुषासो वयुनानि पूर्वथा रुशन्तं भानुमरुषीरशिश्रयुः॥१७५६

Veda : Samveda | Mantra No : 1756

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : उषाः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : आगे फिर उषा का वर्णन है।

पदपाठ : उत् । अपप्तन् । अरुणाः । भानवः । वृथा । स्वायुजः । सु । आयुजः । अरुषीः । गाः । अयुक्षत । अक्रन् । उषासः । वयुनानि । पूर्वधा । रुशन्तम् । भानुम् । अरुषीः । अशिश्रयुः॥

पदार्थ : (अरुणाः) लालिमावाले (भानवः) प्रकाश (वृथा) अनायास (उदपप्तन्) उठ रहे हैं। (अरुषीः) चमकीली उषाओं ने (स्वायुजः) सुख से जुड़नेवाली (गाः) किरणों को (अयुक्षत) पूर्व दिशा के आकाश में जोड़ दिया है। (उषासः) उषाएँ (पूर्वथा) पूर्व दिनों की भाँति (वयुनानि) लोक-जागरण के कर्मों को (अक्रन्) कर रही हैं। (अरुषीः) लालिमावाली ये उषाएँ (रुशन्तम्) चमकीले (भानुम्) सूर्य का (अशिश्रयुः) आश्रय लिये हुए हैं ॥२॥यहाँ स्वभावोक्ति अलङ्कार है। ‘पूर्वथा’ में उपमा है ॥२॥

भावार्थ : जैसे उषाओं के उदय होने पर आकाश और भूतल प्रकाशित हो जाता है, तथा मनुष्य जागृति अनुभव करते हैं, वैसे ही आध्यात्मिक ज्योतिष्मती प्रज्ञाओं के आविभार्व होने पर चित्तपटल निर्मल हो जाता है और आत्मा, बुद्धि, प्राण, इन्द्रियाँ आदि सब योगसिद्धि के लिए सचेष्ट हो जाते हैं ॥२॥