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Samveda/1757

अर्चन्ति नारीरपसो न विष्टिभिः समानेन योजनेना परावतः। इषं वहन्तीः सुकृते सुदानवे विश्वेदह यजमानाय सुन्वते (कि)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१७५७

Veda : Samveda | Mantra No : 1757

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : उषाः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : आगे फिर वही उषा वर्णित की जा रही है।

पदपाठ : अर्चन्ति । नारीः । अपसः । न । विष्टिभिः । समानेन । सम् । आनेन । योजनेन । आ । परावतः । ईषम् । वहन्ती । सुकृते । सु । कृते । सुदानवे । सु । दानवे । विश्वा । इत् । अह । यजमानाय । सुन्वते॥ ।

पदार्थ : (अपसः) कर्मण्य (नारीः न) नारियाँ जैसे (आ परावतः) दूरदेश से भी आकर (समानेन योजनेन) समान योजना बनाकर (विष्टिभिः) कर्मों द्वारा (सुकृते) धर्मात्मा (सुदानवे) उत्तम दानी मनुष्य को (इषम्) अन्न आदि पदार्थ और (सुन्वते) भक्तिरस प्रवाहित करनेवाले तथा (यजमानाय) यज्ञ करनेवाले पुरुष को (अह) निश्चय ही (विश्वा इत्) सभी अभीष्ट वस्तुएँ (वहन्तीः) प्राप्त कराती हुई, उसका (अर्चन्ति) सत्कार करती हैं, वैसे ही ये प्राकृतिक और आध्यात्मिक उषाएँ भी करती हैं ॥३॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥

भावार्थ : जो शुभ कर्म करनेवाले धर्मात्मा, परोपकारी परमेश्वर के उपासक यज्ञकर्ता जन होते हैं, उनका जैसे नारियाँ सत्कार करती हैं, वैसे ही रात्रि के अन्त में लालिमा के साथ छिटकती हुई प्राकृतिक उषाएँ तथा योगमार्ग में अनुभव की हुई ज्योतिष्मती प्रजाएँ भी उनका अभिनन्दन करती हैं अर्थात् प्रेय-मार्ग तथा श्रेय-मार्ग में उनकी सहायता करती हैं ॥३॥