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Samveda/1773

यस्य ते महिना महः परि ज्मायन्तमीयतुः। हस्ता वज्र हिरण्ययम् (व)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥१७७३

Veda : Samveda | Mantra No : 1773

In Hindi:

ऋषि : प्रियमेधः आङ्गिरसः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में परमेश्वर और जीवात्मा का महत्त्व वर्णित है।

पदपाठ : यस्य । ते । महिना । महः । परि । ज्मायन्तम् । ईयतुः । हस्ता । वज्रम् । हिहण्ययम्॥

पदार्थ : हे इन्द्र ! हे परमेश्वर वा जीवात्मन् ! (महः) महान् (यस्य ते) जिस तेरी (महिना) महिमा से (हस्ता) मनुष्य के दोनों हाथ (ज्मायन्तम्) पृथिवी के समान आचरण करनेवाले अर्थात् विशाल, (हिरण्ययम्) ज्योतिर्मय (वज्रम्) व को (परि ईयतुः) ग्रहण करते हैं, वह तू (महित्वना आपप्राथ) महिमा से परिपूर्ण है। [यहाँ ‘महित्वना आपप्राथ’ यह वाक्यपूर्ति के लिए पूर्व मन्त्र से लिया गया है] ॥३॥

भावार्थ : मनुष्य जो विविध शस्त्रास्त्रों का ग्रहण, उन्हें चलाना, शत्रु को जीतना आदि महान् कर्मों को करने में समर्थ होता है, वह महिमा परमेश्वर और जीवात्मा की ही है ॥३॥