Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1781

जुष्टो हि दूतो असि हव्यवाहनोऽग्ने रथीरध्वराणाम्। सजूरश्विभ्यामुषसा सवीर्यमस्मे धेहि श्रवो बृहत् (ला)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥१७८१

Veda : Samveda | Mantra No : 1781

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : पञ्चमः

विषय : आगे फिर योग के विषय में कहते हैं।

पदपाठ : जुष्टः । हि । दूतः । असि । हव्यवाहनः । हव्य । वाहनः । अग्ने । रथीः । अध्वराणाम् । सजूः । स । जूः । अश्विभ्याम् । उषसा । सुवीर्यम् । सु । वीर्यम् । अस्मेइति । धेहि । श्रवः । बृहत्॥

पदार्थ : हे (अग्ने) मार्गदर्शक योगिराज ! (जुष्टः) सेवन किये हुए आप (हि) निश्चय ही (दूतः) दोषों को तपा डालनेवाले, (हव्यवाहनः) प्राप्तव्य योगसिद्धियों को प्राप्त करानेवाले और (अध्वराणाम्) किये जानेवाले अष्टाङ्गयोग रूप यज्ञों के (रथीः) चालक (असि) हो। आप (अश्विभ्याम्) प्राणापानों से (उषसा) तथा ज्योतिष्मती प्रज्ञा से (सजूः) सहायवान् होकर (अस्मे) हमें (सुवीर्यम्) सुवीर्ययुक्त (बृहत् श्रवः) योगशास्त्र का महान् ज्ञान और उससे मिलनेवाला यश (धेहि) प्रदान करो ॥२॥

भावार्थ : अष्टाङ्गयोग का अभ्यास करनेवाले मनुष्य के लिए प्रणव-जप, परमेश्वर की उपासना और योग के गुरु द्वारा बताये हुए मार्ग का अनुसरण करना लक्ष्यप्राप्ति में परम सहायक होते हैं ॥२॥