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Samveda/1782

विधुं दद्राण समने बहूनां युवानसन्तं पलितो जगार। देवस्य पश्य काव्यं महित्वाद्या ममार स ह्यः समान॥१७८२

Veda : Samveda | Mantra No : 1782

In Hindi:

ऋषि : बृहदुक्थो वामदेव्यः | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ३२५ क्रमाङ्क पर चन्द्र-सूर्य और मन-आत्मा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ दूसरी व्याख्या दर्शाते हैं।

पदपाठ : विधुम् । वि । धुम् । दद्राणम् । समने । सम् । अने । बहूनाम् । युवानम् । सन्तम् । पलितः । जगारः । देवस्य । पश्य । काव्यम् । महित्वा । अद्य । अ । द्य । ममार । सः । ह्यः । सम् । आन॥

पदार्थ : (समने) सङ्ग्राम में (बहूनाम्) अनेक शत्रुओं को (विधुम्) बींधनेवाले, (दद्राणम्) उनकी दुर्गति करनेवाले (युवानं सन्तम्) युवा होते भी किसी वीर को (पलितः) बूढ़ा काल (जगार) निगल लेता है। (देवस्य) क्रीडा करनेवाले जगत्पति इन्द्र परमेश्वर के (महित्वा) महान् (काव्यम्) जगत्-रूप दृश्य काव्य को (पश्य) देखो, कि (सः) वह (अद्य) आज (ममार) मरा पड़ा है (यः) जो (ह्यः) कल (समान) भली-भाँति साँस ले रहा था, जीवित था ॥१॥

भावार्थ : बड़ी भारी शक्ति जिनके पास होती है, वे भी मृत्यु के मुख में जाने से नहीं बच पाते, यह देखकर धर्म-कर्मों में और परमात्मा के चिन्तन में मन लगाना चाहिए ॥१॥