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Samveda/1798

श्रुधी हवं विपिपानस्याद्रेर्बोधा विप्रस्यार्चतो मनीषाम्। कृष्वा दुवास्यन्तमा सचेमा॥१७९८

Veda : Samveda | Mantra No : 1798

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : विराट् | स्वर : गान्धारः

विषय : प्रथम मन्त्र में उपास्य-उपासक का विषय वर्णित है।

पदपाठ : श्रुधि । हवम् । विपिपानस्य । वि । पिपानस्य । अद्रेः । अ । द्रेः । बोध । विप्रस्य । वि । प्रस्य । अर्चतः । मनीषाम् । कृष्व । दुवासि । अन्तमा । सचा । इमा॥

पदार्थ : हे इन्द्र जगदीश्वर ! आप (विपिपानस्य) जिसने विशेषरूप से ज्ञान-रस और कर्म-रस का पान कर लिया है, ऐसे (अद्रेः) अविनाशी जीवात्मा की (हवम्) प्रार्थना को (श्रुधि) सुनो, (अर्चतः) पूजक (विप्रस्य) मेधावी विद्वान् की (मनीषाम्) स्तुति को (बोध) जानो। आगे स्तोता को सम्बोधन करते हैं—हे स्तोता ! तू (सचा) अन्य स्तोताओं के साथ मिलकर (इमा) इन (अन्तमा) निकटतम (दुवांसि) पूजाओं को (कृष्व) इन्द्र जगदीश्वर के लिए कर ॥१॥

भावार्थ : हार्दिक निश्छल उपासनाओं को ही परमेश्वर स्वीकार करता है, छल-छिद्रों से युक्त, बनावटी उपासनाओं को नहीं ॥१॥