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Samveda/1801

प्रो ष्वस्मै पुरोरथमिन्द्राय शूषमर्चत। अभीके चिदु लोककृत्सङ्गे समत्सु वृत्रहा। अस्माकं बोधि चोदिता नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु॥१८०१

Veda : Samveda | Mantra No : 1801

In Hindi:

ऋषि : सुदासः पैजवनः | देवता : इन्द्रः | छन्द : शक्वरी | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम मन्त्र में परमात्मा के शत्रुविनाश के गुण की प्रशंसा की गयी है।

पदपाठ : प्र । उ । सु । अस्मै । पुरोरथम् । पुरः । रथम् । इन्द्राय । शूषम् । अर्चत । अभीके । चित् । उ । लोककृत् । लोक । कृत । सङ्गे । सम् । गे । समत्सु । स । मत्सु । वृत्रहा । वृत्र । हा । अस्माकम् । बोधि । चोदिता । नभन्ताम् । अन्यकेषाम् । अन् । यकेषाम् । ज्याकाः । अधि । धन्वसु॥

पदार्थ : हे साथियो ! (अस्मै इन्द्राय) इस जगदीश्वर के महिमा-गान के लिए, (पुरोरथम्) रथ को सबसे आगे रखनेवाले (शूषम्) इसके बल की (प्र अर्चत उ) प्रशंसा करो। वह (अभीके चित् उ) अपने सखा के ऊपर आक्रमण होने पर (लोककृत्) उसे विजय दिलानेवाला होता है। (समत्सु) देवासुरसङ्ग्रामों में (सङ्गे) मुठभेड़ होने पर (वृत्रहा) पाप आदि शत्रुओं का वधकर्ता होता है। वह जगदीश्वर (अस्माकम्) हम वीरों का (चोदिता) प्रेरक होता हुआ (बोधि) हमें उद्बोधन देवे। (धन्वसु अधि) धनुषों पर चढ़ायी हुई (अन्यकेषाम्) शत्रुओं की (ज्याकाः) डोरियाँ (नभन्ताम्) टूट जाएँ, अर्थात् वे साधनहीन होकर पराजित हो जाएँ ॥१॥यहाँ श्लेष से जीवात्मापरक और सेनापतिपरक अर्थ भी जानना चाहिए ॥१॥

भावार्थ : जैसे वीर सेनापति आक्रान्ता शत्रुओं को मारकर अपने राष्ट्र को विजय दिलाता है, वैसे ही परमेश्वर पाप, विघ्न आदि रूप वैरियों को विनष्ट करके अपने उपासकों को विजयी करता है ॥१॥