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Samveda/1802

त्व सिन्धूरवासृजोऽधराचो अहन्नहिम्। अशत्रुरिन्द्र जज्ञिषे विश्वं पुष्यसि वार्यम्। तं त्वा परि ष्वजामहे नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु॥१८०२

Veda : Samveda | Mantra No : 1802

In Hindi:

ऋषि : सुदासः पैजवनः | देवता : इन्द्रः | छन्द : शक्वरी | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा का शत्रु-रहित होना वर्णित है।

पदपाठ : त्वम् । सिन्धून् । अव । असृजः । अधराचः । अहन् । अहिम् । अशत्रुः । अ । शत्रुः । इन्द्रः । जज्ञिये । विश्वम् । पुष्यसि । वार्म् । तम् । त्वा । परि । स्वजामहे । नभन्ताम् । अन्यकेषाम् । अन् । यकेषाम् । ज्याकाः । अधि । धन्वसु॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) जगदीश्वर ! (त्वम्) आप (अहिम्) आनन्द-वर्षा में बाधक विघ्न-समूह को (अहन्) नष्ट करते हो और फिर (सिन्धून्) आनन्द के प्रवाहों को (अधराचः) जीवात्मा के अभिमुख करके (अवासृजः) छोड़ देते हो। आप (अशत्रुः) शत्रु-रहित (जज्ञिषे) हो। आप (विश्वम्) सब (वार्यम्) वरणीय उपासक-समाज को (पुष्यसि) पुष्टि देते हो। (तं त्वा) उन आपका, हम (परिष्वजामहे) आलिङ्गन करते हैं। ऐसा करो, जिससे (अन्येषाम्) शत्रुओं की (धन्वसु अधि) धनुषों पर चढ़ायी हुई (ज्याकाः) डोरियाँ (नभन्ताम्) टूट जाएँ ॥२॥

भावार्थ : जैसे सूर्य वर्षा की रुकावट को नष्ट करके बादलों से जल-धाराएँ छोड़कर सब प्राणियों और ओषधि आदि को पुष्टि देता है, अथवा जैसे कोई सेनापति ऐश्वर्य-प्रतिबन्धक शत्रु को मार कर राष्ट्र में ऐश्वर्य की धाराएँ प्रवाहित करके प्रजा को पोषण देता है, वैसे ही जगदीश्वर आनन्द के प्रतिबन्धक विघ्नों को दूर करके उपासक के अन्तरात्मा में आनन्द की धाराएँ बहाकर उसे परिपुष्ट करता है ॥२॥